Monday, 23 October 2017

डरने लगा हूँ मैं....

डरने लगा हूँ मैं...

डरने लगा हूँ मैं कि,
अगर वो दर्द भरा मटका जो
मैंने अब तक दिल के किसी कोने में छिपाए रखा था,
वो मटका अगर फूट जाए तो क्या होगा ?

डरने लगा हूँ मै कि,
जिस डर से मैं भाग रहा हूँ,
वही मेरे सामने आकर खड़ा हो जाये,
तो क्या होगा ?

क्या होगा जब वो सवाल फिर से दागे जाएंगे,
फिर से उन चिट्ठियों के हिसाब मांगे जाएंगे,
चिट्ठियां जो "सिर्फ" कलम से नही लिखी जाती थीं,
चिठियाँ जिनमे "सिर्फ" शब्द नही होते थे,
जब उन चिठ्ठियों का हर एक हर्फ़ मुझसे तुम्हारी वफादारी के सुबूत मांगेंगे,
तो क्या होगा?

डरने लगा हूँ मैं कि,
अगर वो दर्द भरा मटका जो
मैंने अब तक दिल के किसी कोने में छिपाए रखा था,
वो मटका अगर फूट जाए तो क्या होगा?

सर्दी के दिनों में टपरी की वो चाय,
जहाँ एक कटिंग में दो दिलों की कम्पन शांत होती थी,
अब सिर्फ एक ही होठ के निशान पाकर,
यदि वो गिलास मुझसे तुम्हारी गुमशुदगी का कारण मांगे ,
तो क्या होगा?
ये सब सोच सोच कर
अंदर ही अंदर मरने लगा हूँ मैं,
अब डरने लगा हूँ मैं ।

डरने लगा हूँ क्योंकि मैंने भांप लिया है,
कि, जिस दिन ये मटका फूटेगा,
मेरे मन कि अदालत में अर्ज़ली चीख उठेगा,
तमाशबीन आएंगे,
कुछ ताली बजायेंगे,
कुछ कल के अखबार के लिए समान जुटाएंगे,
कटघरे में तुम होगी,
जज की कुर्सी पर मेरा दिल,
अर्ज़ली की चीख पर , मेरा दाखिला होगा
हाँ या न में मुझसे पूछा जाएगा ,
कि इस घात का , इस दर्द का क्या तुम्ही कारण हो,
अब तक मैं बहुत बहुत डर चुका था,
मगर जो उस वकील ने उंगली तुम्हारे ऊपर उठा कर कहा,
कि कहो हाँ, हाँ कह दो कह दो की यही है कारण तुम्हारी अकेली रातों का,
तुम्हारे अधूरे सपनो का,
कह दो की यही कारण है,
तुम्हारे सूखे आंसुओ का,
तुम्हारे तुम्हारे ही नज़रो में अपमान का,
और हद से ज़्यादा मुस्कान का,
यही कारण है कह दो....
बस....
अब बस..
एक शब्द और नही... बोल उठा मैं,
दर्द ऐसेही ही बहुत है, अब न और घात कर,
जो बोलना है बोल, मगर उससे उंगली नीची करके बात कर,
नही है वो गुन्हेगार,
नही है ये वो जिसने मुझे तकलीफ दी है,
ये दर्द मेरा है,
मेरा अपना है,
मेरी औकात इनकी हैसियत से कम हो भले
मगर इस दर्द को बांटना तो दूर, ये मेरे दर्द कि सज़ा के काबिल ही नही है।

इसलिए महोदय, आपको जो सज़ा देनी है , मुझे दें,
इसलिए नही क्योंकि इसमें उनकी हिफाज़त है,
बल्कि इसलिए ,
क्योंकि मुझे आदत है,
क्योंकि मुझे आदत है।।

Thursday, 17 August 2017

MOM of today's meeting:-

1. All the accociates are required to take their places in labs by 8.30am , and attendance would be taken and uploaded by 8.45 am .Late comers names would be reported.

2. Associates are requested not to misuse their id cards. Id cards should only be used within the technopark campus and should strictly be avoided while going out for trips.

3. Security guards near the reception desk should be informed while leaving the premises during the working hours, either for medical reasons or whatever the issue may be.

4. Techno park and the tcs campus is well guarded with cctv cameras, so any indisciplined activity is closely monitored, so all should be aware of that.

5. Please ensure that the roads are not blocked while moving out of the campus.Footpaths should be used instead.

6. Weekend plans should uploaded on the site, and GRs should be well aware of the weekend trips of the respective LG mates.

7. Any kind of celebration within the technopark campus should be in a disciplined manner.

8. No male associates should stay back in the campus after the last bus at 7.40 pm.

9. Actions would be taken against the indisciplined associates:-

*Extension of their ILP duration.
*Writing about their behavior in their  file
*Change in the base locations.

TVM 03 - LG (TIS 13, 14,15,16,17,18 and 19)

Saturday, 5 August 2017

We are here for now..
Don't know how long wud it be..
Time will fly,
These days wud never be thr to see..
Moments that we make today
Wud be memories for tomorrow...
Celebrations and joys
Would make room for sorrow..
When you wud be thr,
I might not be..
Or when I would want a stare
You would be nowhere to see...
Whatever be the scene...
"Friends" is the word that define us..
And that would forever be..
No promises, no regrets...
A call in even 6 months...
And smile would search out for lips..
A wave of hand..a "hi" someday..
And heart wud spare some time for itself...
Images, flashbacks and emotions
Wud find a way to let loose..
Eyes wud glimmer , and start to talk..
Words might not be required for the eve...
Head might go for a toss...
Heart wud move down the lane ...
Down the memory lane for a walk...
Happy friendship day ....

Saturday, 15 April 2017

इंसान मैं हारा हुआ निकला..

यश और जीत की उम्मीद में,
मैं अपनों से जी चुरा निकला,
जीती दुनिया , पैसा भी,
पर इंसान मैं हारा हुआ निकला।

खुद के रिश्ते चीर फाड़ कर,
मैं दुनिया के दिल में बनाने जगह निकला,
दिल खोलकर अपनाया उसने,
पर मैं उसके लिए भी बेवफा निकला।

उम्मीद जग जाये तो हिम्मत बंध जाती है,
इस उम्मीद में मैं बनाने दुनिया के लिए उम्मीद का महल निकला,
पर अपनों की जब साँसें अंतिम चल रही थीं, मैं बाजू से टहल निकला।

सिखाती है दुनिया, आगे बढ़ने के लिए ठगना पड़ेगा,
जुमला मैं ये अपनों पर ही चढ़ा निकला,
दुनियादारी तो सीख ली मगर,
रिश्तेदारी में फिसड्डी बहुत बड़ा निकला।

था मेरा भी परिवार कभी,
खुद की ख़ुशी के लिए मैं उनका गला दबा निकला,
जीती दुनिया, पैसा भी ,मगर
इंसान मैं हारा हुआ निकला।।

Thursday, 13 April 2017

तुम मुझे सुन सकती हो तो सुन लो,
मैं खुश हूँ।

Tuesday, 11 April 2017

क्यों न पूछूँ..

क्यों न पूछूँ कि तुम्हारा हाल कैसा है,
तुम सोचते हो कि भला ये सवाल कैसा है?
क्यों न फोन मिलाऊँ दफ्तर में तुम्हें,
ये जानने कि आज खाने का कमाल कैसा है?
क्यों न पूछूँ कि तुम्हारा हाल कैसा है?

सफेदी की परत चढ़ा कर जो रुमाल देती हूँ,
घर आते आते दागदार हो जाता है
तो क्यों न पूछूँ भला कि आज रुमाल कैसा है?
तो क्यों न पूछूँ कि हाल कैसा है?

घर से निकलते हो तो सब्ज़ियों से ताज़े रहते हो,
घर आते आते चेहरा क्यों बेहाल ऐसा है?
और वैसे आज तो पहली तारीख है,
फिर आज चेहरे पर ये मलाल कैसा है?
अब माथे कि शिकन से क्या क्या अंदाज़े लगाऊं,
इसलिए तो पूछ लेती हूं कि हाल कैसा है?

सारे हाथों का बोझा खुद पर ले लेते हो,
और पगार कि लाइन में सबसे पीछे रहते हो,
वाह वाही भर भर घर लाते हो,
और पैसे मांगू तो ठेंगा दिखाते हो
हालत तुम्हारी मुझसे छिपी नहीं,
पर तुम्हारे इंतज़ार में बैठे बैठे,
मन में उठता ये उबाल जाने कैसा है?
मैं निर्दोष हूँ, मन बांवरा,
यही कहता है तो पूछती हूँ तुमसे
कि तुम्हारा हाल कैसा है?
और तुम सोचते हो कि ये सवाल कैसा है?


Wednesday, 5 April 2017

मौसम बदल रहा है

मौसम बदल रहा है,
हर वक्त लगता है जैसे कहीं,
कोई लम्हा हाथ से फिसल रहा है
मौसम बदल रहा है।

धड़कने अब उफान मारने लगी हैं,
मन बिखरे रिशतों को समेटने में लगा है,
दिमाग यादों को सहेज कर सजा रहा है,
दोस्त एक दूसरे के नाम पैगाम लिख रहे हैं,
मुँह जिन्होंने फेरा था , पास आने के बहाने ढूंढ रहे हैं,
मोहब्बत करने वाले , दिल को समझाने में लगे हैं, मोहब्बत जिन्हें रास न आयी, वो अगली के पटाने में लगे हैं,
आँखों में निस दिन बाढ़ के संकेत दिखाई देते हैं,
जाने बाँध कब टूट जाये
ये सैलाब कब फूट जाये,
बैठे बैठे , हृदय जाने क्यों मचल रहा है,
शायद इसने भी भाप लिया है,
के मौसम बदल रहा है,
हर वक्त जैसे कहीं कोई लम्हा
हाथ से फिसल रहा है,
मौसम बदल रहा है।