Tuesday, 6 October 2026

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पापा आओ बैठो,
कुछ शिकायतें हैं आपसे

कैसे कर लेते थे
हल्की झुंझलाहट, लाल आंखे और एक जोरदार थप्पड़
यही तो था रास्ता जो बाकी भी लेते थे
भौहें तानकर, वजनदार कर वाणी को
ऐसे ही तो बच्चों की गलती पर शिक्षा देते थे
पर नहीं चले उस पथ पर आप
राह चुनी आपने मनमानी
सीख सलाह नजरों से दे गये
गुस्से में भी नर्म थी वाणी
दुनिया रटाते रह गई चार ज्ञान की बातें
पिटारे में आपके थी हर सबक की एक कहानी
सागर सी गहरी आँखों से मानो
सम्मोहित कर लेते थे
पर कभी न सिखाया इशारों पर चलना
मेरे जीवन को खुद की साँसों से नहीं कभी भर देते थे
हर उतार में हर चढ़ाव में
अनोखे अनजाने पड़ाव में
निज मन के भीतर गोते खाते 
अनिश्चिताओं से घिरी नाव में
कभी हाल पूछा जाए तो




लठ के डर से जहां कहीं बच्चे
रटते रहते ज्ञान की बातें चार
जाने आपके पास कैसे होती हर सबक की एक कहानी



न गालो ने और न ही पीठ ने कभी
पहचानी आपकी हाथों की छाप
पर नज़रो से आपने जो भी कहा
जीवन भर के लिए दिल पर छप गई वो बात




Monday, 31 August 2026

बीते वक्त कि गठरी से..

बीते वक्त की यादों की गठरी पर

आज धूल की परत अपना दावा पेश कर रही है,

मानो कई साल गांव वापस न लौटने पर

किसी बाबू की पुरखौती ज़मीन पर

पड़ोसी ने ईंट-बालू गिरवा दिया हो।


मगर कौन चाहता है इस गठरी की गाँठ खोलना?

गाँठ खुलेगी तो साफ़ हथेली पर धूल चढ़ेगी,

और उन लम्हों को भी फिर जीना होगा,

जिनसे कभी मैं मरकर गुज़रा हूँ।


फिर भी, कुछ लम्हे इस पोटली में ऐसे हैं

जिन्हें टटोलने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती;

सिर्फ़ नज़र पड़ते ही

वे हूबहू आँखों के सामने तैर जाते हैं—

मानो इस वीरान गठरी की सारी शान

उसी एक शाम, उसी एक पल से बंधी हो।


याद आ रहा है वो दिन

जब कदम लड़खड़ा रहे थे मेरे शर्म से,

भर रात मन में उनकी तस्वीर लिए

शब्दों को माला में पिरोया था बड़े जतन से।

उसी माला को उन्हें पहनाना था,

मुझे मेरी कविता को उनसे मिलाना था।


मैं जब-जब संकोच के धुएं को

बेबाकी के पंखे से हांकने की कोशिश करता,

हिचकिचाहट और बढ़ जाती—

मानो बुझती राख ने पंखे की हवा पकड़ ली हो!


खैर, एक लम्बी सांस सीने में भर

लड़खड़ाते कदमों को समेटा था,

पास उनके गया और

कविता का पन्ना उनको थमा बैठा था।


स्पर्श मात्र पाकर उनके हाथों का

कविता के शब्द यूँ मुस्कुरा कर खिल उठे,

जैसे सावन की पहली फुहार—

महीनों गुज़र जाते हैं जिसके इंतज़ार में,

और झूम उठता है तिनका भी बस एक ही दीदार में!!


Friday, 28 August 2026

सफ़र खत्म होने वाला है ....

आज सफ़र खत्म होने वाला है

मंजिल खड़ी बस कुछ दूर ही अब
मंज़र ये बेहद निराला है
आज सफ़र खत्म होने वाला है

थाल सजाए हाथ में, खड़ी है तिलक वो करने को,
मंजिल उतनी ही आतुर है, जितना मै उसपर मरने को
रो चुका हूं इस लम्हे पर कई बार, ख़्वाबों में इस कदर
कि मुलाकात पर शायद अश्रु न होंगे झरने को

एक मुद्दत के बाद मानो, 
प्यासे को सावन का निवाला मिलने वाला है,
आज सफ़र खत्म होने वाला है

पर क्यों मंजिल को बस देखने भर से ही,
लगा कि पा लिया सब, 
पर जैसे बहुत कुछ छूटने वाला है,
इंतजार था जिस पल का,
वो पल तो घटने वाला है,
पर क्या सचमुच सफर खत्म होने वाला है?

पल ये कही छल तो नहीं
राहगीर को खुशफहमी से मोहित करने वाला
मृगतृष्णा का जल तो नहीं
अगर नहीं, 
तो फिर लुप्त कहां वो सारे भाव,
जो मंजिल के तलाश में बैठे थे
कहां वो जोश वो उमंग कहां
वो हर्षित जीवन तरंग कहां
क्यों उन्माद का आभास नहीं
खुशी है , पर क्यों उल्लास नहीं

मंज़िल की आँखों में जब आज, अक्स अपना छपा पाया,
तब जाना कि अंतर्मन में, बोध एक अनूठा छाया
कि जीवन अनंत, ये मंज़िल तो बस छोटा सा अल्पविराम है,
मंज़िलें मुकम्मल होती रहेंगी, पर सफर की कहाँ कोई शाम है?
गिरते - संभलते , कभी जीतते, कभी ठोकर खाते
अनगिनत मंजिलों पर विजय पताका फहराते
सफ़र जीवन का सफल होने वाला है
एक मंजिल के आलिंगन में आते ही
सफ़र एक नया शुरू होने वाला है
सफ़र यह कभी न खत्म होने वाला है...


Friday, 7 August 2026

माँ बनते देखा है

खरोच जो लग जाये ज़रा, 
या पैर कहीं लड़ जाए तो,
भर दिन विलाप तू करता है, 
ज़ख्म जहाँ पनपे भी नहीं उस पर भी मरहम मलता है,
सोच दशा क्या होगी उसकी,
तेरा वंश जो सींच रही है
निज के खून के कतरे से ही
दो दो जीवन खींच रही है ।।

कहते हैं जन्म दूसरा होता है,औरत का, 
शिशु के कोख में आने से
उत्साह, उमंग ,उम्मीद, के उन्माद में
कष्ट सह जाती वो हर बहाने से

कभी बेचैन करते सवालों के सैलाब,
कभी जी मचलता इच्छाओं के दमन से
तन कभी पीड़ा सहता है
कभी अश्रु झरते हैं अंतर्मन से

9 महीनों का सफ़र आलौकिक,
हर सफल कसौटी, ममता का एक नया बीज बोती है
अनभिज्ञ निज मन के प्रवाह से
उसे नित दिन नई अनुभूति होती है

खिल उठना , सावन में कलि के जैसे,
पल भर में फिर मुरझा जाना,
पकवानों का अम्बार लगा कर,
बस एक निवाला ही खा पाना,
छन छन करते पायल-बिछुओं का,
शांत अचानक हो जाना,
या दर्पण में खुद का स्वरूप 
हर दिन कुछ बदला सा पाना,

निज के प्रतिबिंब को निहारते
भाव अंतर्मन का, नयन बयां कर देते हैं
बदलाव से समझौता करने की टीस ज़रा सी है किन्तु,
मात्र स्पर्श भर ही गर्भ का, उसे मीठी उम्मीद से भर देते हैं

तेज चेहरे पर आजाता, मन के द्वंद परे हट जाते हैं,
अचल दृढ़ता देख उसकी, वेदनाओं के बदल छट जाते हैं,
और, कुछ दाग ऐसे होते है, जो जीवन निर्मल कर जाते हैं,
छपे निशान शरीर पर, उसके साहस की गाथा गाते हैं।  

कभी हंसते चेहर के पीछे, उसे दर्द से रोते देखा है,
कभी शिशु से बात करते, उससे मन मिलाते देखा है,
नींद कभी छिन जाए, तो भर रात करवट बदलते देखा है,
बेखबर, चुलबुली सी लड़की को, जिम्मेदारी को समझते देखा है,
मैने अपनी पत्नी को, हर दिन माँ बनते देखा है !! 









Monday, 3 May 2021

शायद तुम भूल चुकी हो

हँसाना बखूबी आता है तुम्हें,
मगर हँसना शायद तुम भूल चुकी हो,
अपनी मुस्कुराहट को होठों से, दिल तक पहुंचाने का रास्ता,
शायद तुम भूल चुकी हो,
सबकी आंखों से आंसू बखूबी पोछती हो,
मगर खुद रोना शायद तुम भूल चुकी हो,
गड़े हैं ज़ख्म जो दिल में तुम्हारे,
उन्हें आंखों तक पहुंचाने का रास्ता,
शायद तुम भूल चुकी हो....
घर का हर कोना तुमसे खिल उठता है,
मगर अपनों के लिए , सपनो का घर बनाते बनाते,
अपने सपने, शायद तुम भूल चुकी हो...

Wednesday, 15 April 2020

जाओ मगर, जल्दी आना

जाओ मगर... जल्दी आना.. 

कल जब तुम शायद, आखिरी बार मिलोगी मुझसे, 
सिर्फ मेरे चेहरे पर ही, अपनी निगाहों को सीमित रखना, 
मेरा मन न टटोलना.. 
मेरे हस्ते चेहरे से बस इतना ही भाँप लेना, 
कि मैं खुश हूँ... 
मगर एक टक यूँ निहारना भी सही न हो शायद, 
मुस्काते हुए, आँसुओं को रोकना 
थोड़ा मुश्किल होगा.. 
ये सैलाब तुम्हारे जाने के बाद ही आये तो बेहतर है, 
मैं तुम्हारे सपनों को, इस बाढ़ मे बहते देख नहीं सकता.. 

कल जब तुम शायद, आखिरी बार मिलोगी मुझसे, 
देखूँगा मैं, क्या इस बार भी तुम, 
बिना बताये, मेरे ही रंग के कपड़ो मे सामने आती हो.. 
और अगर ऐसा होता है... तो इस राज़ से कल तुम्हे पर्दा तो उठाना होगा... 
कैसे तुम्हे बिना बताये ये पता लग जाता है... 
तुम्हे मुझे बताना होगा.. 
मगर कल बोलने का काम सिर्फ तुम ही करना, 
ज्यादा बोलना मेरे लिए ठीक न होगा, 
और ऐेसेभी तुम हमेशा कहती थी, 
कि मैं सुनता नहीं बात तुम्हारी कोई, 
कल का दिन, इस शिकायत का भी आखिरी दिन होगा

तुम्हारा दिया हुआ पहला गुलाब, 
आज भी, मेरी डायरी के उन्ही दो पन्नों के बीच जवान है, 
एक तरफ मेरी पहली कविता जो तुमने पढ़ी थी, 
दूसरी तरफ, लाल लिपस्टि मे लिपटे तुम्हारे होठों के निशान है, 
तुम्हारी गैर हाज़िरी मे अब, 
उस गुलाब से ही तुम्हारी खबर लेता रहूँगा, 
वादा तो नहीं कर सकता, 
मगर कहता हूँ, बस मान लो, 
मैं खुश रहूँगा।। 








Sunday, 20 October 2019

Are we really overutilised or just being a cry baby??

Right from the day we join our offices, we start being too critical about various things that we didnt even care about in the past but we have into it's waters for all throughout our lives. We followed similar lifestyles in the past yet we crticize it now.Lets get this point wise:-

In schools/colleges: We used to go to school 6 days a week(some had half days on Sat) , mostly for a duration of about 6-7 hrs including breaks. Each lecture used to stretch for about 40 to 50 mins, we sat in class ,some even slept, for those lullabyes that seemed to go on forever. BUT WE NEVER COMPLAINED. 

In offices:- Now we go to office for 5 days a week, some for 6 days a week (u get an extra day off in that case) mostly for a duration of 9 hours including breaks. We are spending an avg of 2-3 hrs more in office, of what we used to spend in school, and with age and experience that seems quite normal. If a 12 yr old used to spend 6 hrs at his workplace, then for the same individual at 24 , spending 9-10 hrs at his present workplace, is quite normal. (If he/she has the same productivity level of course) YET WE ARE ALWAYS IN COMPLAINING MODE. 

In schools/colleges:- There used to be weekly assessments, regular homeworks, halfyearly semesters, yearly projects, vivas, annual concerts, sports competitions and the list goes on. Still you managed pretty well. 

In offices:- Deadlines. Meet it or mess it up. Which I guess is no wrong.The company hired you for the same, and not for just increasing it's workbench (remember the insane level of negotiations you made in the on campus interview...:-p)Working for an organization demands a bit of patriotism for the same, and a true patriot of any organization will not always meet the requirements, but will do so 18 out of 20 times with passion.

In schools/colleges:- Indian schools on an average has about 60-70 holidays (including vacations) , but then we also have something called extra classes which some schools offer in order to complete the syllabus, no worries. 
But as one moves to college these numbers reduce to about 40 holidays (apx) (mass bunks not considered:-p)with no extra time for sports or cultural events, interested students managed both classes and activities on their own with 75 percent attendance a must. 

In offices :- Taking my company as a reference, we have around 35 annual leaves, apart from sick leaves others need to be taken with prior permission, and if you have a wise manager that is not a problem, else you can keep on taking sick leaves:-p (jugaad). 

In school/colleges:- you pay the fees. 

In offices:- you get salary. 

Bottom line of the story:-

We are all too critical about our company, without even knowing that we are also not doing much to serve. We are doing nothing different that what we used to do in our yester years. Always remember while you are at your desk criticizing your job, there are about 35prcnt of educated youth, probably with same degree that you posses, with no jobs. 

YOUR JOB IS NOT YOUR DUTY, IT IS A RESPONSIBILITY!!