कुछ शिकायतें हैं आपसे
कैसे कर लेते थे
हल्की झुंझलाहट, लाल आंखे और एक जोरदार थप्पड़
यही तो था रास्ता जो बाकी भी लेते थे
भौहें तानकर, वजनदार कर वाणी को
ऐसे ही तो बच्चों की गलती पर शिक्षा देते थे
पर नहीं चले उस पथ पर आप
राह चुनी आपने मनमानी
सीख सलाह नजरों से दे गये
गुस्से में भी नर्म थी वाणी
दुनिया रटाते रह गई चार ज्ञान की बातें
पिटारे में आपके थी हर सबक की एक कहानी
सागर सी गहरी आँखों से मानो
सम्मोहित कर लेते थे
पर कभी न सिखाया इशारों पर चलना
मेरे जीवन को खुद की साँसों से नहीं कभी भर देते थे
हर उतार में हर चढ़ाव में
अनोखे अनजाने पड़ाव में
निज मन के भीतर गोते खाते
अनिश्चिताओं से घिरी नाव में
कभी हाल पूछा जाए तो
लठ के डर से जहां कहीं बच्चे
रटते रहते ज्ञान की बातें चार
जाने आपके पास कैसे होती हर सबक की एक कहानी
न गालो ने और न ही पीठ ने कभी
पहचानी आपकी हाथों की छाप
पर नज़रो से आपने जो भी कहा
जीवन भर के लिए दिल पर छप गई वो बात
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