Monday, 31 August 2026

बीते वक्त कि गठरी से..

बीते वक्त की यादों की गठरी पर

आज धूल की परत अपना दावा पेश कर रही है,

मानो कई साल गांव वापस न लौटने पर

किसी बाबू की पुरखौती ज़मीन पर

पड़ोसी ने ईंट-बालू गिरवा दिया हो।


मगर कौन चाहता है इस गठरी की गाँठ खोलना?

गाँठ खुलेगी तो साफ़ हथेली पर धूल चढ़ेगी,

और उन लम्हों को भी फिर जीना होगा,

जिनसे कभी मैं मरकर गुज़रा हूँ।


फिर भी, कुछ लम्हे इस पोटली में ऐसे हैं

जिन्हें टटोलने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती;

सिर्फ़ नज़र पड़ते ही

वे हूबहू आँखों के सामने तैर जाते हैं—

मानो इस वीरान गठरी की सारी शान

उसी एक शाम, उसी एक पल से बंधी हो।


याद आ रहा है वो दिन

जब कदम लड़खड़ा रहे थे मेरे शर्म से,

भर रात मन में उनकी तस्वीर लिए

शब्दों को माला में पिरोया था बड़े जतन से।

उसी माला को उन्हें पहनाना था,

मुझे मेरी कविता को उनसे मिलाना था।


मैं जब-जब संकोच के धुएं को

बेबाकी के पंखे से हांकने की कोशिश करता,

हिचकिचाहट और बढ़ जाती—

मानो बुझती राख ने पंखे की हवा पकड़ ली हो!


खैर, एक लम्बी सांस सीने में भर

लड़खड़ाते कदमों को समेटा था,

पास उनके गया और

कविता का पन्ना उनको थमा बैठा था।


स्पर्श मात्र पाकर उनके हाथों का

कविता के शब्द यूँ मुस्कुरा कर खिल उठे,

जैसे सावन की पहली फुहार—

महीनों गुज़र जाते हैं जिसके इंतज़ार में,

और झूम उठता है तिनका भी बस एक ही दीदार में!!


Friday, 28 August 2026

सफ़र खत्म होने वाला है ....

आज सफ़र खत्म होने वाला है

मंजिल खड़ी बस कुछ दूर ही अब
मंज़र ये बेहद निराला है
आज सफ़र खत्म होने वाला है

थाल सजाए हाथ में, खड़ी है तिलक वो करने को,
मंजिल उतनी ही आतुर है, जितना मै उसपर मरने को
रो चुका हूं इस लम्हे पर कई बार, ख़्वाबों में इस कदर
कि मुलाकात पर शायद अश्रु न होंगे झरने को

एक मुद्दत के बाद मानो, 
प्यासे को सावन का निवाला मिलने वाला है,
आज सफ़र खत्म होने वाला है

पर क्यों मंजिल को बस देखने भर से ही,
लगा कि पा लिया सब, 
पर जैसे बहुत कुछ छूटने वाला है,
इंतजार था जिस पल का,
वो पल तो घटने वाला है,
पर क्या सचमुच सफर खत्म होने वाला है?

पल ये कही छल तो नहीं
राहगीर को खुशफहमी से मोहित करने वाला
मृगतृष्णा का जल तो नहीं
अगर नहीं, 
तो फिर लुप्त कहां वो सारे भाव,
जो मंजिल के तलाश में बैठे थे
कहां वो जोश वो उमंग कहां
वो हर्षित जीवन तरंग कहां
क्यों उन्माद का आभास नहीं
खुशी है , पर क्यों उल्लास नहीं

मंज़िल की आँखों में जब आज, अक्स अपना छपा पाया,
तब जाना कि अंतर्मन में, बोध एक अनूठा छाया
कि जीवन अनंत, ये मंज़िल तो बस छोटा सा अल्पविराम है,
मंज़िलें मुकम्मल होती रहेंगी, पर सफर की कहाँ कोई शाम है?
गिरते - संभलते , कभी जीतते, कभी ठोकर खाते
अनगिनत मंजिलों पर विजय पताका फहराते
सफ़र जीवन का सफल होने वाला है
एक मंजिल के आलिंगन में आते ही
सफ़र एक नया शुरू होने वाला है
सफ़र यह कभी न खत्म होने वाला है...


Friday, 7 August 2026

माँ बनते देखा है

खरोच जो लग जाये ज़रा, 
या पैर कहीं लड़ जाए तो,
भर दिन विलाप तू करता है, 
ज़ख्म जहाँ पनपे भी नहीं उस पर भी मरहम मलता है,
सोच दशा क्या होगी उसकी,
तेरा वंश जो सींच रही है
निज के खून के कतरे से ही
दो दो जीवन खींच रही है ।।

कहते हैं जन्म दूसरा होता है,औरत का, 
शिशु के कोख में आने से
उत्साह, उमंग ,उम्मीद, के उन्माद में
कष्ट सह जाती वो हर बहाने से

कभी बेचैन करते सवालों के सैलाब,
कभी जी मचलता इच्छाओं के दमन से
तन कभी पीड़ा सहता है
कभी अश्रु झरते हैं अंतर्मन से

9 महीनों का सफ़र आलौकिक,
हर सफल कसौटी, ममता का एक नया बीज बोती है
अनभिज्ञ निज मन के प्रवाह से
उसे नित दिन नई अनुभूति होती है

खिल उठना , सावन में कलि के जैसे,
पल भर में फिर मुरझा जाना,
पकवानों का अम्बार लगा कर,
बस एक निवाला ही खा पाना,
छन छन करते पायल-बिछुओं का,
शांत अचानक हो जाना,
या दर्पण में खुद का स्वरूप 
हर दिन कुछ बदला सा पाना,

निज के प्रतिबिंब को निहारते
भाव अंतर्मन का, नयन बयां कर देते हैं
बदलाव से समझौता करने की टीस ज़रा सी है किन्तु,
मात्र स्पर्श भर ही गर्भ का, उसे मीठी उम्मीद से भर देते हैं

तेज चेहरे पर आजाता, मन के द्वंद परे हट जाते हैं,
अचल दृढ़ता देख उसकी, वेदनाओं के बदल छट जाते हैं,
और, कुछ दाग ऐसे होते है, जो जीवन निर्मल कर जाते हैं,
छपे निशान शरीर पर, उसके साहस की गाथा गाते हैं।  

कभी हंसते चेहर के पीछे, उसे दर्द से रोते देखा है,
कभी शिशु से बात करते, उससे मन मिलाते देखा है,
नींद कभी छिन जाए, तो भर रात करवट बदलते देखा है,
बेखबर, चुलबुली सी लड़की को, जिम्मेदारी को समझते देखा है,
मैने अपनी पत्नी को, हर दिन माँ बनते देखा है !!