Friday, 7 August 2026

माँ बनते देखा है

खरोच जो लग जाये ज़रा, 
या पैर कहीं लड़ जाए तो,
भर दिन विलाप तू करता है, 
ज़ख्म जहाँ पनपे भी नहीं उस पर भी मरहम मलता है,
सोच दशा क्या होगी उसकी,
तेरा वंश जो सींच रही है
निज के खून के कतरे से ही
दो दो जीवन खींच रही है ।।

कहते हैं जन्म दूसरा होता है,औरत का, 
शिशु के कोख में आने से
उत्साह, उमंग ,उम्मीद, के उन्माद में
कष्ट सह जाती वो हर बहाने से

कभी बेचैन करते सवालों के सैलाब,
कभी जी मचलता इच्छाओं के दमन से
तन कभी पीड़ा सहता है
कभी अश्रु झरते हैं अंतर्मन से

9 महीनों का सफ़र आलौकिक,
हर सफल कसौटी, ममता का एक नया बीज बोती है
अनभिज्ञ निज मन के प्रवाह से
उसे नित दिन नई अनुभूति होती है

खिल उठना , सावन में कलि के जैसे,
पल भर में फिर मुरझा जाना,
पकवानों का अम्बार लगा कर,
बस एक निवाला ही खा पाना,
छन छन करते पायल-बिछुओं का,
शांत अचानक हो जाना,
या दर्पण में खुद का स्वरूप 
हर दिन कुछ बदला सा पाना,

निज के प्रतिबिंब को निहारते
भाव अंतर्मन का, नयन बयां कर देते हैं
बदलाव से समझौता करने की टीस ज़रा सी है किन्तु,
मात्र स्पर्श भर ही गर्भ का, उसे मीठी उम्मीद से भर देते हैं

तेज चेहरे पर आजाता, मन के द्वंद परे हट जाते हैं,
अचल दृढ़ता देख उसकी, वेदनाओं के बदल छट जाते हैं,
और, कुछ दाग ऐसे होते है, जो जीवन निर्मल कर जाते हैं,
छपे निशान शरीर पर, उसके साहस की गाथा गाते हैं।  

कभी हंसते चेहर के पीछे, उसे दर्द से रोते देखा है,
कभी शिशु से बात करते, उससे मन मिलाते देखा है,
नींद कभी छिन जाए, तो भर रात करवट बदलते देखा है,
बेखबर, चुलबुली सी लड़की को, जिम्मेदारी को समझते देखा है,
मैने अपनी पत्नी को, हर दिन माँ बनते देखा है !! 









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