आज सफ़र खत्म होने वाला है
मंजिल खड़ी बस कुछ दूर ही अब
मंज़र ये बेहद निराला है
आज सफ़र खत्म होने वाला है
थाल सजाए हाथ में, खड़ी है तिलक वो करने को,
मंजिल उतनी ही आतुर है, जितना मै उसपर मरने को
रो चुका हूं इस लम्हे पर कई बार, ख़्वाबों में इस कदर
कि मुलाकात पर शायद अश्रु न होंगे झरने को
एक मुद्दत के बाद मानो,
प्यासे को सावन का निवाला मिलने वाला है,
आज सफ़र खत्म होने वाला है
पर क्यों मंजिल को बस देखने भर से ही,
लगा कि पा लिया सब,
पर जैसे बहुत कुछ छूटने वाला है,
इंतजार था जिस पल का,
वो पल तो घटने वाला है,
पर क्या सचमुच सफर खत्म होने वाला है?
पल ये कही छल तो नहीं
राहगीर को खुशफहमी से मोहित करने वाला
मृगतृष्णा का जल तो नहीं
अगर नहीं,
तो फिर लुप्त कहां वो सारे भाव,
जो मंजिल के तलाश में बैठे थे
कहां वो जोश वो उमंग कहां
वो हर्षित जीवन तरंग कहां
क्यों उन्माद का आभास नहीं
खुशी है , पर क्यों उल्लास नहीं
मंज़िल की आँखों में जब आज, अक्स अपना छपा पाया,
तब जाना कि अंतर्मन में, बोध एक अनूठा छाया
कि जीवन अनंत, ये मंज़िल तो बस छोटा सा अल्पविराम है,
मंज़िलें मुकम्मल होती रहेंगी, पर सफर की कहाँ कोई शाम है?
गिरते - संभलते , कभी जीतते, कभी ठोकर खाते
अनगिनत मंजिलों पर विजय पताका फहराते
सफ़र जीवन का सफल होने वाला है
एक मंजिल के आलिंगन में आते ही
सफ़र एक नया शुरू होने वाला है
सफ़र यह कभी न खत्म होने वाला है...
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